भाग्योदय ......पहला अध्याय
ज्ञानप्रकाश -- यथा नामे ...तथा गुणे ...अथाह ज्ञानी , संसार में चल रहे प्रत्येक विषय पर वे धाराप्रवाह बोलते थे ....लेकिन उनका यह अथाह ज्ञान न तो उनके मन को भर सका और न ही उनकी और उनके परिवार की आवश्यकताएं ही पूरी कर सका !!
.........................................................................खिड़की से सिर टिका कर लगभग खाली कम्पार्टमेंट में ...वे बैठे थे और ट्रेन अपनी रफ़्तार से भागी जा रही थी . ज्ञानप्रकाश जी अपनी पत्नी से दुःखी होकर , मरने के इरादे से सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचे थे . उनके सामने से ही दर्जनों गाड़ियाँ धड़धडाती गुजर गईं ...लेकिन वे किसी के आगे कूदे ही नहीं ...जबकि एक फुलस्केप कागज पर उन्होंने वहीं प्लेटफार्म पर बैठ कर एक ' मार्मिक सुसाइड नोट ' लिखा था .....जो अभी भी उनकी जेब में था .
वे खड़े खड़े पटरियां देख रहे थे लेकिन वास्तव में वे कुछ भी नहीं देख रहे थे . उन्हें अनुभव हुआ कि उनके पैर थकने लगे हैं और खड़े रहने से मना कर रहे हैं . उसी समय न जाने कौन सी ट्रेन आकर उनके सामने खड़ी हो गई ....शायद ये ट्रेन वहीं से बन कर चलती थी इसीलिए उसकी खिड़कियां और दरवाजे बंद थे ....और श्री ज्ञान प्रकाश जी एक डिब्बे में जाकर खिड़की खोल कर बैठ गए .
रात के डेढ़ बजे थे और उनकी पलकें नींद से बोझिल हो रहीं थीं और वे सो गए . उनकी आँखे खुलीं तो सुबह के पांच बज रहे थे और ट्रेन पूरी रफ़्तार से दौड़ रही थी .......
उन्हें तम्बाकू की जोरदार तलब लगी उन्होंने जेब से पुड़िया निकाली और बनाने लगे . तम्बाकू ठोंक ..होठों में रखने के बाद वे उठे और टॉयलेट चले गए . टॉयलेट सीट पर बैठे श्री ज्ञानप्रकाश जी पुनः अपने में गुम हो गए ......उन्होंने नौकरी की , दुकान की , खेती की और भी जाने क्या क्या किया लेकिन हाय री किस्मत .....! वे कहीं सफल न हुए और अंततः बिलकुल बेरोजगार हो गए . ये तो ईश्वर की कृपा थी कि वे तनहा कई करोड़ की खेतिहर जमीन के मालिक थे लेकिन खेती कर नहीं पाते थे . जब भी वे स्वयं खेती करते तो उनकी किस्मत उनके आगे आगे चलती और कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता कि उनकी पूँजी भी डूब जाती . लेकिन लीज़ पर लेने वाले उन्हें इतना तो दे देते कि परिवार का पेट भर जाता और जरूरी खर्चे न रुकते . उन्होंने सारे दुःख सहे लेकिन जमीन को पैसे में बदलने का उन्हें खयाल भी न आया ......
पैसे की कमी हुई और जब उनके परिवार में चादर के अनुरूप ही पैर पसारने की स्थिति बनी तो कलह बढ़ने लगी . परिजनों में ग़म ओ गुस्सा पलने ,फलने और फूलने लगा . श्री ज्ञानप्रकाश जी को ...इन परिस्थितियों का कारण समझ उनकी पत्नी तनी तनी रहने लगी और झगड़ा करने के बहाने तलाशने लगी .......तभी ट्रेन को ब्रेक लगे और झटके से ज्ञानप्रकाश जी सामने मुँह के बल गिर पड़े . किसी तरह अपने को सँभालते वे खड़े हुए और लड़खड़ाते कदमों से वापस लौट खिड़की के किनारे ...एक सीट पर बैठ गए .
किसी बड़े स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी शायद . भीड़ की रेलमपेल मची थी और कुछ ही देर में श्री ज्ञानप्रकाश जी के कम्पार्टमेंट में खड़े होने की जगह भी न बची . अगले तीन स्टेशनो तक पहुँचते पहुँचते गाड़ी फिर खाली हुई और उस ' एस - 4 ' में वही लोग बचे जिनकी सीट रिजर्व थी . अभी तक जिस सीट पर ज्ञानप्रकाश जी बैठे थे उसका मालिक आया नहीं था और कुछ ही देर बाद अपने ढेर सारे सामान के साथ एक आदमी आया और श्री ज्ञानप्रकाश जी के सामने साइड लोवर सीट पर आमने सामने बैठ गया . अपना सामान ठीक से रखने के बाद उसने एक उड़ती नज़र ज्ञानप्रकाश जी पर डाली और अपना स्मार्टफोन निकाल कर उसमें घुस गया .....फिर वहाँ मौन छा गया .
चाय ..गरम चाय ....खिड़की से आवाज़ आयी . उसने मोबाइल से सिर उठाया और चाय वाले नें उन दोनों को आमने सामने बैठा देख दो कप चाय ....खिड़की पर रख दी और पैसे लेकर चलता बना . सुबह के सात बज रहे थे ...बसंत का मौसम था ....न ठंडा न गरम ...
ज्ञानप्रकाश जी के पड़ोसी नें उनसे चाय पीने का संकेत किया और चाय पीते पीते फिर मोबाइल में खो गया .
चलती ट्रेन में अचानक अफरातफरी मच गई और कुछ ही देर में सबको पता चल गया कि ट्रेन में " मजिस्ट्रेट चेकिंग " हो रही है .
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चारबाग रेलवे स्टेशन पर जी आर पी थाने में अपने कक्ष में बैठा मजिस्ट्रेट .....सामने लाइन में खड़े दर्जनों बिना टिकट यात्रियों को अपराध के अनुरूप दंड सुना रहा था .......
ज्ञानप्रकाश जी सूनी आँखों से जमीन देख रहे थे , उनके होठों पर पपड़ी जमा थी , बाल बिखरे थे , दो दिन से शेव नहीं हुई थी सो दाढ़ी के छोटे छोटे सफेद बाल दिखने लगे थे .......धाराप्रवाह बोलने वाले श्री ज्ञानप्रकाश जी ...24 घंटे से एकदम चुप थे ...उनके दिमाग में एक पर एक घटनायें फ़िल्म की तरह गुजर रहीं थीं ..........कल लगभग इसी समय शाम चार बजे वे शब्जी लेने बाजार गए थे . रास्ते में तगादेदारों नें घेर लिया था ....इस बात से वे टेंशन में थे और रात नौ बजे एक बहुत छोटी से बात हुई .....जो दावानल बन गई .......ज्ञानप्रकाश जी अपने आप में ही इतने गुम थे कि उन्होंने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि उनकी पत्नी नें अभी अभी घर में पोंछा लगाया है और फर्श सीसे की तरह चमक रहा है . वे खटपट करते अभी किचेन तक पहुंचे भी न थे कि अपनी पत्नी को क्रोध भरी आँखों से घूरते पाया और फिर ......इतना ध्वनि प्रदूषण फैलाया उनकी पत्नी नें कि उन्होंने कान में उंगली डाल ली . उनकी इस हरकत पर पत्नी को और गुस्सा आ गया . बड़बड़ करती बीवी नें खाना सिर्फ इसलिये नहीं बनाया कि वे शब्जी देर से क्यों लाये ? बात बढ़ती गई और फिर " चप्पल पहन कर घर में क्यों घुसे ? " की चप्पल जाने कहाँ छूट गई और कई ऐतिहासिक घटनायें वाकयुद्ध के दौरान दोहराई गईं और महाज्ञानी श्री ज्ञानप्रकाश जी के सब्र का बाँध टूट गया और उन्होंने अपनी पत्नी के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया . पाँचो उंगलियां उभर आईं . एक मिनट के लिए सन्नाटा छा गया और सामान्यतः न सुनाई देने वाली दीवालघड़ी की टिकटिक स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी ...........और फिर अचानक भयानक विस्फोट हुआ .....पत्नी नें बच्चों के सामने एक साँस में हजार गालियाँ देते हुए जिंदगी में पहली बार अपने पति को बुरी तरह पीटा . उस पर तो जैसे " काली " सवार हो गईं और वो अपने पति श्री ज्ञानप्रकाश जी को कॉलर पकड़ कर घसीटती हुई दरवाजे तक लाई और धकेल कर बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर लिया .....ज्ञानप्रकाश जी के दिमाग में फुलझड़ियाँ छूट रहीं थी .....वे कुछ देर सुन्न बैठे रहे और उठ कर स्टेशन आकर ट्रेन में बैठ गए .....उस समय से चुप श्री ज्ञानप्रकाश जी चौबीस घंटे बीत चले थे ...अभी तक चुप थे .............
चलो ! आगे बढ़ो ...साहब बुला रहे हैं ...कहते हुए एक सिपाही नें उन्हें आगे धकियाया ....!
साहब नें उन्हें सिर से पाँव तक देखा और उनकी आँखे देख एक बारगी चौंक गया फिर बोला .....नाम ?
चुप ....
अरे! मैंने कहा नाम बताओ भाई .....
चुप......
क्यों भाई ये तो कुछ बोलते नहीं ,क्या आरोप है इन पर ?....मजिस्ट्रेट नें आजिज स्वर में दरोगा से पूछा .
दरोगा बोला ... साहेब ! बिना टिकट पकड़ाए हैं , जुर्माना भी न दे रहे .
मजिस्ट्रेट नें सिर हिलाया और एक सरकारी कागज पर कलम घुमाते हुए कहा .....हाँ भाई ....नाम ...?
चुप .........
जब कई बार पूछने पर भी ज्ञानप्रकाश जी मौन ही रहे तो मजिस्ट्रेट नें दारोगा को " तलाशी " लेने का हुक्म दिया .....और तलाशी में जो चीजें मिलीं वे थीं ...एक पेन , 500 रूपए और " वो सुसाईड नोट " ....जिसमें उनकी पत्नी को ही सम्बोधित किया गया था ....एक तरह से कह सकते हैं कि वह एक दुख भरा पत्र था . उस पत्र को न्यायाधीश पांच मिनट तक पढ़ता और कुछ सोचता रहा .....फिर उसनें उन्हें किनारे बैठने को कहा .
रात के आठ बजने वाले थे और दरोगा उनके सामने केस डायरी और पेन लिए कम से कम सौ बार ज्ञानप्रकाश जी से उनका नाम पूछ चुका था . मजिस्ट्रेट सामने न होता तो अब तक दो चार थप्पड़ तो जड़ ही चुका होता ......अंततः मजिस्ट्रेट नें दरोगा को रोका और केस डायरी में जो विवरण लिखा गया वो इस प्रकार था --
ओर भी बहुत कुछ लिखा ....लेकिन ज्ञानप्रकाश जी के विषय में " कानून " को जो जानकारी थी ......वो इतनी ही थी और इस जानकारी का श्रोत था ....वो सुसाईड लेटर जो उन्होंने अपनी पत्नी को लिखा था और वो इस प्रकार था ---
इस पत्र में न कोई पता लिखा था और न फोन नंबर .
इस पत्र को और पांच सौ रूपए को उनकी अमानत समझ जमा किया गया और उन्हें तीन महीने की जेल की सजा हुई .
जेल में आये श्री ज्ञान प्रकाश जी को तीन दिन बीते थे और अभी तक उनका मौन भंग नहीं हुआ था .
क्रमशः जारी ......
चलो ! आगे बढ़ो ...साहब बुला रहे हैं ...कहते हुए एक सिपाही नें उन्हें आगे धकियाया ....!
साहब नें उन्हें सिर से पाँव तक देखा और उनकी आँखे देख एक बारगी चौंक गया फिर बोला .....नाम ?
चुप ....
अरे! मैंने कहा नाम बताओ भाई .....
चुप......
क्यों भाई ये तो कुछ बोलते नहीं ,क्या आरोप है इन पर ?....मजिस्ट्रेट नें आजिज स्वर में दरोगा से पूछा .
दरोगा बोला ... साहेब ! बिना टिकट पकड़ाए हैं , जुर्माना भी न दे रहे .
मजिस्ट्रेट नें सिर हिलाया और एक सरकारी कागज पर कलम घुमाते हुए कहा .....हाँ भाई ....नाम ...?
चुप .........
जब कई बार पूछने पर भी ज्ञानप्रकाश जी मौन ही रहे तो मजिस्ट्रेट नें दारोगा को " तलाशी " लेने का हुक्म दिया .....और तलाशी में जो चीजें मिलीं वे थीं ...एक पेन , 500 रूपए और " वो सुसाईड नोट " ....जिसमें उनकी पत्नी को ही सम्बोधित किया गया था ....एक तरह से कह सकते हैं कि वह एक दुख भरा पत्र था . उस पत्र को न्यायाधीश पांच मिनट तक पढ़ता और कुछ सोचता रहा .....फिर उसनें उन्हें किनारे बैठने को कहा .
रात के आठ बजने वाले थे और दरोगा उनके सामने केस डायरी और पेन लिए कम से कम सौ बार ज्ञानप्रकाश जी से उनका नाम पूछ चुका था . मजिस्ट्रेट सामने न होता तो अब तक दो चार थप्पड़ तो जड़ ही चुका होता ......अंततः मजिस्ट्रेट नें दरोगा को रोका और केस डायरी में जो विवरण लिखा गया वो इस प्रकार था --
नाम ..........................ज्ञान प्रकाश
पिता का नाम ..............अज्ञात
पत्नी का नाम ..............उमा
पता ...........................अज्ञात
अपराध ......................बिना टिकट रेल यात्रा
ओर भी बहुत कुछ लिखा ....लेकिन ज्ञानप्रकाश जी के विषय में " कानून " को जो जानकारी थी ......वो इतनी ही थी और इस जानकारी का श्रोत था ....वो सुसाईड लेटर जो उन्होंने अपनी पत्नी को लिखा था और वो इस प्रकार था ---
प्रिय उमा ( यहाँ प्रिय शब्द लिखा गया फिर काटा गया)
तुम्हारा दुर्भाग्य था कि मैं तुम्हें मिला . तुम जैसी गुणी ,
सुंदर और बुद्धिमान पत्नी ....किसी और के साथ होती तो उसके भाग्य खुल जाते लेकिन ये मेरा दुर्भाग्य था जो तुम्हारे दुर्भाग्य का कारण बना .
मैं अब तक किये गए हर उस काम के लिए तुमसे माफी मांगता हूँ जो तुम्हारी दृष्टि में गलत थे . अब तुम्हारे जीवन का दुर्भाग्य ....दुनिया से जा रहा है . अब खुश रहो .
तुम्हारा (यहाँ ये शब्द लिखा गया फिर काटा गया )
ज्ञान प्रकाश
इस पत्र में न कोई पता लिखा था और न फोन नंबर .
इस पत्र को और पांच सौ रूपए को उनकी अमानत समझ जमा किया गया और उन्हें तीन महीने की जेल की सजा हुई .
जेल में आये श्री ज्ञान प्रकाश जी को तीन दिन बीते थे और अभी तक उनका मौन भंग नहीं हुआ था .
उसी जेल की बैरक नंबर तेरह में ....खूँखार बदमाश टोनी ब्रिगेंजा बंद था और उस दिन .......
क्रमशः जारी ......
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