ब्लैक एंड व्हाइट

 (यह लेख पूरी तरह काल्पनिक है .किसी भी व्यक्ति का इस लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है .)
मेरे एक अनोखे मित्र हैं ....लेखक हैं और उनका दावा है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में जो कुछ भी लिखा है ....अक्षरसः सत्य है .उनका यह भी कहना है कि सत्तर प्रतिशत लोग उनकी ही तरह हैं ...उनकी उक्त आत्मकथा अभी तक अप्रकाशित है .मैं उनकी अनुमति से और गोपनीयता की शर्त पर कुछ बातें आपसे साझा करूँगा और अंत में एक प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़ूंगा .
तो कथा प्रारम्भ होती है तब से जब वे बाइस साल के थे ...किसी प्रकार का कोई नशा नहीं करते थे .स्त्री प्रसंग से तो सर्वथा अपरिचित ही थे .थोड़ा दब्बू किस्म के थे ....किसी लड़की से कभी आंख मिलाकर बात नहीं कर पाते थे .लेकिन उनका मन बड़ा चंचल था .लोग उन्हें बहुत शरीफ और चारित्रिक दृढ व्यक्ति के रूप में जानते थे .....उनकी छवि आज भी वैसी ही है .
इसी दौरान स्नातक करने के दौरान उनके एक सहपाठी नें उन्हें तम्बाकू मिश्रित पान मसाला खाना सिखा दिया और वे लोगों से छुप कर गुटखा खाने लगे .फिर एक दिन उनके पिताजी नें उन्हें पकड़ लिया और जबरदस्त डांट फटकार पड़ी .कुछ समय बाद वे तम्बाकू खाने लगे ....तब तक वे पचीस छब्बीस बसंत देख चुके थे .
उपन्यास पढ़ने का शौक चढ़ा तो कभी कभी बालिग लोगों के लिए अश्लील साहित्य भी पढ़ लेते थे ....चोरी छिपे .धीरे धीरे उनके दो विपरीत व्यक्तित्व विकसित होते गए .एक व्यक्तित्व तो बाहरी था और दूसरा भीतरी .
बाहरी आवरण में वे एक बेहद ईमानदार और चरित्रनिष्ठ व्यक्ति थे .प्रतिदिन पूजापाठ करना और धार्मिक साहित्य गंभीरता पूर्वक पढ़ना उनकी आदत थी .
कभी कभी उनका दूसरा व्यक्तित्व उभर आता था ....
जिसके बारे में उनके अतिनिकट इने गिने लोग ही जानते थे . जब कभी अंदर वाला जागता तो वे चोरी छिपे शराब भी पी लेते थे .पोर्न फिल्में भी देख लेते थे
और इस प्रकार उनके दोनों व्यक्तित्व आगे पीछे चलते रहे .
इन विपरीत ध्रुवों पर रहते हुए उनका जो मानसिक विकास हुआ ....वह बड़ा अजीब और विलक्षण था .
वे जब विद्वानों के मध्य बैठते तो उनकी प्रकांड विद्वता प्रकट होती थी और सुनने वालों पर बड़ा अच्छा प्रभाव भी पड़ता था .
और जब वे अपने माहौल से निकल कर वे ऐसी जगह पहुंचते ....जहां उन्हें जानने वाला कोई भी न होता तो वे एक आदी शराबी और पथभ्रष्ट लगने लगते थे .इन दोनों व्यक्तित्वों में आपसी संघर्ष होता रहता था और इस संघर्ष में कभी पहला जीतता कभी दूसरा .
अब जैसे कि मैंने पहले ही कहा था कि अंत में मैं आपके लिए एक प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़ूँगा और वो यह है कि क्या उनके अनुसार ये बात सही है कि सत्तर प्रतिशत व्यक्ति ऐसे ही मिश्रित होते हैं ?

Comments

Anil. K. Singh said…
दुहरा व्यक्तित्व सत्रर प्रतिशत से अधिक लोगों में पाया जाता होगा। महत्वपूर्ण यह है कि दुहरे व्यक्तित्व में पोषण किसको मिला। वाल्मीकि का पहला व्यक्तित्व और पोषण मिलने के बाद फिर दूसरा व्यक्तित्व । अब आप पोषण किसको देंगे खुद तय कर लीजिए।

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