भाग्य का खेल (भाग - 1 )

मित्रों !
" खुश रहो " एक साहित्यिक ब्लॉग है .इसका उद्देश्य,
एक आम आदमी के जीवन में घटने वाली घटनाओं का उसके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को कहानियों और लेखों के माध्यम से व्यक्त करना है .इनमें कुछ सत्य घटनाएँ हैं और कुछ काल्पनिक .
कुछ मित्रों ने पूछा है कि हम कमेंट लिखते हैं लेकिन वह पब्लिश नहीं होता .इसके लिए दोस्तों ! आप सीधा गूगल या किसी सर्च इंजन पर www.ramkaho.blogspot .com सर्च करें .वहां से आप कमेंट्स भेज सकते हैं .
सधन्यवाद
आप का मित्र
हैप्पी अरुण
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प्रस्तुत है आज की कहानी जो एक सत्य घटना पर आधारित है .......
घर के बाहर बरामदे से सटे एक छोटे से कमरे में 
जनवरी की ठंड में " वह " रजाई ओढ़े सोया था .
कुछ ऊबन अनुभव हुई तो मुँह से रजाई खींच ली 
और लम्बी लम्बी सांसे लेने लगा .
तभी उसके पेट में जोर की ऐंठन हुई और मजबूर 
होकर वह घर से बाहर निकला .डिब्बा उठा कर 
सड़क पार की और सड़क के किनारे ही बैठ गया 
कुछ देर बैठा रहा और जब पेट साफ हुआ तो राहत मिली .इसी बीच सड़क से एक तेज रफ़्तार 
बाइक गुजरी और खट्ट की आवाज के साथ कोई चीज सड़क पर गिरी और उकड़ूँ बैठे उसके दोनों पैरों के बीच टकराई .वह हड़बड़ा कर खड़ा हुआ .एक हाँथ से अपनी नेकर पकड़ी और दूसरे हाँथ से उस ' चीज ' को उठाया और उस दिशा में देखने लगा जिधर बाइक गई थी .
अपने कमरे में लेटा वह उस मोबाइल फ़ोन
को बड़े गौर से देख रहा था जो उस बाइक
से गिरा था .उस समय मोबाइल फ़ोन का
जमाना शुरू ही हुआ था और इसे रखना
प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था .वह केवल इतना ही जानता था कि हरा बटन फोन सुनने के लिए और लाल बटन बंद करने के काम आता है .फोन को देर तक उलटने पलटने के बाद उसे नींद आने लगी और उसे सिरहाने रख कर वह सो गया .
" वह " एक साधारण किसान परिवार का सबसे छोटा लड़का था .परिवार में पिताजी खेती बाड़ी सँभालते थे  .दो बड़े भाई किसी शहर में मेहनत मजदूरी करते थे .माँ घर संभालती थी और सबसे बड़े भाई की शादी हो चुकी थी लेकिन उसकी पत्नी जाने क्यों अक्सर मायके में ही रहती थी .परिवार में 'वह ' सबका दुलारा था और बड़े भाइयों की कृपा और स्नेह के कारण लगभग पचीस किलोमीटर दूर शहर के एक प्रतिष्ठित
कॉलेज में स्नातक प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था .
" वह" घर से पचीस किलोमीटर साईकिल चला कर शहर जाता था .वहाँ एक कमरे में चार सहपाठियों के साथ रहता और बनाता खाता और पढ़ता था ,पढ़ता क्या टाइम पास करता था .इन दिनों कॉलेज में इलेक्शन का माहौल था और पढ़ाई लिखाई ठप थी .
उसके सारे दोस्त अपने अपने घर जा चुके थे और आज रात वह भी घर आ गया था .पिताजी किसी
रिश्तेदारी में गए थे और वह भोजन करके अपनी कोठरी में सोने चला गया जो उसके लिए लगभग रिजर्व थी .रात के एक बजे थे और अचानक 
फ़ोन की घंटी बजने लगी .वह हड़बड़ा कर उठा 
और फ़ोन का हरा बटन दबा कर कान से लगा लिया ,अभी वह कुछ बोलता कि आवाज आयी ..
....' कल सुबह दस बजे फलां रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर एक के सामने स्टेशन मास्टर के घंटे के नीचे पहुँचो और हाँथ में लाल रुमाल बांध कर आना ' वह कुछ बोलता इसके पहले फोन कट गया .और उसने फौरन लाल रंग का बटन 
दबाया ...बटन कुछ ज्यादा दबा तो फोन एक सुरीली आवाज के साथ स्विचऑफ हो गया .फिर वह बेचैनी से करवट बदलने लगा ....उसे फिर नींद नहीं आई .
अठारह वर्ष की उम्र में उसने एक गंभीर बेवकूफ़ी की ..लेकिन इसी को तो ' भाग्य ' कहते हैं .सुबह जो कुछ मिला खाकर और अपनी माँ को पट्टी पढ़ा कर वह साइकिल चलाता पच्चीस किलोमीटर दूर रेलवेस्टेशन पहुँचा ,अपनी लाल लँगोटी फाड़ कर कलाई में लपेटा और स्टेशन मास्टर के घंटे के नीचे जाकर बैठ गया .पूरा स्टेशन सुनसान था .इक्का दुक्का यात्री दिख रहे थे .वह स्टेशन नया नया बना था और इक्का दुक्का गाड़ियां ही रूकती थीं .
दस बज गए थे और उसके दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी .पांच मिनट ...दस मिनट ...पंद्रह मिनट बीत गए और एक ट्रेन सामने प्लेटफार्म पर धीमी हुई और लगभग रुक गई .अचानक एक आदमी ट्रेन से उतर कर तेज कदमों से उसके पास आया और अपने कंधे से एक साधारण किन्तु बड़ा बैग उतारकर ........        .... " उसके " सामने रखा और जितनी तेजी से आया था उतनी तेजी से वापस चला गया और ट्रेन नें रफ़्तार पकड़ ली .उसका दिमाग सांय सांय 
कर रहा था .वह बड़ी देर तक बैठा रहा और फिर बैग उठा कर टॉयलेट में घुस गया .अंदर से कुंडी लगा कर उसने बैग खोला तो ........
क्रमशः जारी ....

Comments

Anil. K. Singh said…
कहानी रोचक लग रही है लेकिन अभी तक कुछ समझ में नहीं आया
Saras Pandey said…
Chacha g story bahut rochak h but aage kya hua....?
Btaye.....
Saras Pandey said…
Padhne aur janne ki utsukta adhik ho gyi