भाग्य का खेल (भाग .2 )

मित्रों !
आज मैं एक पुस्तक में मकड़ियों का स्वभाव विषय पर पढ़ रहा था .एक स्थान पर मैंने पढ़ा कि मकड़ी अपना भोजन प्राप्त करने के लिए जाल बुनती है और कभी कभी अपने ही बुने जाल में स्वयं ही उलझ जाती है .और कई दिनों ,हफ्तों और कभी कभी महीनों तक अपने ही बुने जाल में फंसी रहती है .एक दिन उसे अहसास होता है कि ये जाल तो उसका ही बुना है तब वह अपने ही बुने जाल की गोली बना कर ,निगल जाती है और मुक्त हो जाती है .
क्या हम लोग भी अपने ही बुने जाल में नहीं उलझे हैं ?यदि निकलना चाहें तो निकल भी सकते हैं .
........................................................
........................................................
प्रस्तुत है कहानी " भाग्य का खेल " का दूसरा भाग .....
और वह बैग लेकर टॉयलेट में घुस गया ,अंदर से कुंडी लगाकर जब उसने बैग खोला तो बैग ....
हरे हरे नोटों से भरा हुआ था .उसे चक्कर आने लगा और वह अंग्रेजी मॉडल के कमोड पर बैठ गया .बड़ी देर तक बैठा रहा ...उसका गला सूखने लगा और उसने टॉयलेट में लगे नल से ही मुँह सटाकर गटागट पानी पिया और जोर जोर से सिर हिलाने लगा .....
शहर के अपने कमरे में वह अकेला था और बिस्तर पर लेटा टकटकी बांधे छत की तरफ देख रहा था .सुबह से शाम हो गई और उसने दिन भर कुछ नहीं खाया था ..अब उसे भूख लगी थी .
वह बिस्तर से उठा ,बैग खोला और केवल एक नोट निकाल कर बैग सरका कर खटिया के नीचे किया .नोट पैंट की जेब में रख कर वह कुछ सोचने लगा .फिर उसने बाल्टी उठाई और हैंडपंप पर पंहुचा .कम से कम पाँच बाल्टी पानी से नहाया और जनवरी की ठण्ड में थरथर  कांपते और दांत किटकिटाते हुए वापस कमरे में पहुँच कर जल्दी जल्दी कपड़े पहन कर सीधा मंदिर पहुँचा .
मंगलवार था ..शाम के समय मंदिर भक्तों से खचाखच भरा था .प्रसाद की दुकान पर पहुँच कर उसने 501 रूपए का प्रसाद लिया और एक हजार का नोट दिया .दुकानदार ने नोट हाँथ में लेकर रोशनी की तरफ किया ......तो " उसके " दिल की धड़कन बढ़ने लगी ..कहीं ये नकली नोट तो नहीं ?....हाय !कहीं मैंने गलती तो नहीं कर दी ?
अगले ही पल दुकानदार ने नोट गल्ले में रख कर 
उसे सौ सौ के पाँच नोट पकड़ाए ..उसने दुकानदार से फुटकर और कुछ रेजगारी मांगी और उसने ख़ुशी ख़ुशी दे दी .एक रूपए का सिक्का देकर वो दुकानदार से बोला ..प्रसाद पाँच सौ एक 
का है  .दुकानदार खुश हो गया .
अब वह मंदिर के रास्ते में बैठे हर भिखारी को कुछ न कुछ देता हुआ मंदिर में पहुंचा .आधे घंटे बाद वापस लौट कर उसी प्रसाद की दुकान पर बैठ अपने जूते पहनते हुए उसने प्रसाद का डिब्बा खोला और वही बैठे बैठे सारे देशी घी के बचे लड्डू खा गया .
रास्ते में एक दर्जन केले और कुछ फल खरीद कर जब वह कमरे में वापस लौटा तब उसे मोबाइल फ़ोन की याद आई .वह वापस मुड़ा और लगभग भागते हुए नदी के किनारे पहुंचा और मोबाइल फोन पानी में फेंक दिया .तभी .....
एक आदमी पीछे से आया और उसे हड़काते हुए बोला ...क्या फेंका पानी में ?उसने उसका हाँथ झटका ..जेब में हाथ डालकर एक सिक्का निकाल कर नदी में फेंकता हुआ बोला .....
...प्रसाद .आज मेरा जन्मदिन है .मंदिर से लौटा हूँ ,देख नहीं रहे मेरे माथे पर लगा टीका .पिताजी 
ने कहा था ..सरयू मइया को प्रसाद चढ़ा देना ,वही चढ़ाया है .जाओ पता करो .वह आदमी शंकालु आँखों से उसे देखता हुआ वापस चला गया .
और वह लम्बी लम्बी साँसे लेता लड़खड़ाते कदमों से पुनः अपने कमरे में पंहुचा और बिस्तर पर गिर पड़ा .केले और फल मेज़ पर पड़े थे लेकिन उसने उधर देखा तक नहीं .सारी रात उसे नींद नहीं आई .
सुबह उठ कर उसे बैग का ख्याल आया और खटिया के नीचे झाँक कर जब उसने देखा तो 
बैग !!!................
क्रमशः जारी ...
कल पढ़िए कहानी का अंतिम भाग ...


Comments

Anil. K. Singh said…
बहुत रहस्यमय कहानी है। अच्छा लग रहा है