ये सपना सच होगा ???

 प्राचीन भारतीय समाज वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित था .इस व्यवस्था को समझे बिना केवल राजनीतिक कारणों से इसकी बहुत आलोचना हुई है ...और आज भी हो रही है .
आज हम पूर्वाग्रहों से रहित होकर एक नई और सकारात्मक दृष्टि से इसे देखने का प्रयास करते हैं

 वर्णाश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षक वर्ग जिसे ब्राह्मण कहा जाता था ...त्याग और तपस्या का आश्रय लेकर आबादी से दूर... तत्कालीन शासन के आधीन रह कर उनके संरक्षण में ..." गुरुकुल " संचालित किया करते थे .इन गुरुकुलों में हर वर्ग का व्यक्ति ..चाहे वह सैनिक हो ,व्यवसायी हो ,शिल्पकार हो ,सेवक हो या स्वयं शासक ही हो ...अपने बच्चों (जिनमें बालक और बालिका दोनों शामिल होते थे )
को शिक्षा प्राप्त करने हेतु भेजता था .
उन बच्चों को चाहे वे जिस वर्ग से सम्बंधित हो ...एक ही व्यवस्था में एक साथ रहना होता था .
जिस प्रकार आज नर्सरी से उच्च शिक्षा की व्यवस्था है ..उसी प्रकार ..उन आश्रमों मैं भी पाँच वर्ष से पच्चीस वर्ष तक के आयुवर्ग को निःशुल्क और सामान शिक्षा दी जाती थी .और इन्हे ब्रह्मचारी कहा जाता था .प्राचीन ग्रंथो में कई प्रसिद्ध गुरुकुलों का वर्णन आता है .प्रमाण के लिए तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों के खंडहर आज भी मौजूद हैं .
उस समय बच्चा चाहे राजा का हो या गरीब का सभी को आश्रम की सफाई करना ,लकड़ी काटना ,पशुओं की देख रेख करना और अपने दैनिक कार्य स्वयं करने होते थे .इस प्रकार वह बालक कठिन परिश्रम करता हुआ बड़ा होता था और स्नातक बन कर घर लौटता था ...इसके बाद वह अपनी शिक्षा अनुसार अपनी जीविका का चयन कर ....विवाह करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था .
उस समय के समाज में चाहे जितने विभेद रहे हों लेकिन लोगों के मन में विभेद नहीं था ....क्योकि शिक्षा व्यवस्था निःशुल्क और समान थी .

आधुनिक समाज में शिक्षा की असमानता और कठिन परिश्रम की प्रवृत्ति न होने के कारण ....ऊपर से भले ही दीखता हो कि समानता  आ गई है या आ रही है ..
....लेकिन लोगों के मन में विभेद बढ़ गया है .
अब शिक्षा संस्कार की नहीं ..केवल पेट भर जाए और जरूरतें पूरी हो जाएँ केवल इसी दृष्टिकोण से दी जाती है और ली जाती है .
कैसे भी करके एक छोटी बड़ी नौकरी मिल जाए बस यही लक्ष्य है आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था का .आज भारत का कोई विश्वविद्यालय .....विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल नहीं ..यह प्रमाण काफी है ये बताने के लिए कि नॉलेज से ज्यादा प्लेसमेंट इनका लक्ष्य है  . अंततः ......
केवल इतना ही कहना है कि यदि सामाजिक समरसता और समानता के साथ विकास चाहिए तो शिक्षा समान और निःशुल्क होनी चाहिए .....
लेकिन अभी तो यह सपना ही लगता है .....आशा है ...सपना एक दिन सच होगा !!!!

Comments

Anil. K. Singh said…
सपना सच हो जाये तो बहुत अच्छा होगा।