मनोरंजन (अध्याय .1 )
बात करते हैं स्मार्ट फोन की .इसकी सबसे बड़ी खूबी है कि यदि यह हाँथ में है तो पूरी दुनिया हाँथ मे है .दुनिया तो मुट्ठी में आ गई लेकिन व्यक्ति नितांत अकेला हो गया .वह एक पूर्ण आभासी दुनिया में जी रहा है और वास्तविकता से कटा ,परिवार से कटा ,अपनी भड़ास सोशल मीडिया के जरिये गाली गलौज कर निकाल रहा है .
पानी और मन का एक ही स्वभाव है ....नीचे जाना .और इस अनियंत्रित मन के कारण एक नासमझ बच्चे से लेकर समझदार व्यक्ति तक सभी वही देखते सुनते हैं जो " नहीं देखना चाहिए" एक भयानक नैतिक पतन की ओर अग्रसर ये समाज ....मनोरंजन के नाम पर क्या क्या नहीं देखता .इसका परिणाम है " भयंकर अपराध और असाध्य मानसिक रोग ."
स्कूल की वाद विवाद प्रतियोगिताओं का एक
प्रमुख विषय है ...विज्ञान वरदान या अभिशाप
यहाँ एक तरफ स्मार्ट फ़ोन एक वरदान है ...तो
दूसरी तरफ एक भयानक अभिशाप . बहुत बड़ी
कीमत चुका रहे हैं हम इस वैज्ञानिक तरक्की की
मैं विज्ञान का विरोधी नहीं केवल उसके विवेक - -पूर्ण उपयोग का पक्षधर हूँ .जिस प्रकार एक नाबालिक को वोट देने का अधिकार नहीं ,वाहन चलाने का लाइसेंस नहीं ...उसी प्रकार बिना पर्याप्त मानसिक प्रशिक्षण के इस वैज्ञानिक साधन का सबके लिए खुला उपयोग ...प्रतिबंधित होना चाहिए .
अब बात करते हैं टेलीविजन की ....सैकड़ों चैनल्स के साथ यह साधन भी सर्वसुलभ है ....लेकिन गंभीरता
...आप कहेंगे मनोरंजन में गंभीरता ...हाँ जी सही पढ़ा आपने ....गंभीरता गायब है .
बेसिरपैर के सीरियल्स जो सालों तक चलते हैं और फिर भी पता नहीं चलता ..कौन किसका पति है और कौन पत्नी .अब तो समाचार चैनल भी मनोरंजक धारावाहिक बन गए हैं .ये चैनल समाचार दिखाने सुनाने के बजाय ...विवाद पैदा
करने में आगे रहते हैं .एक घटना घटी हफ्तों तक उसी पर चर्चा चल रही है .जब तक कोई और बड़ी घटना नहीं घट जाती .और फिर उस घटना पर चर्चा शुरू हो जाती है और जिन पुरानी घटनाओं पर हफ़्तों बहस चली वे जाने कहाँ दफ़न हो जाती हैं .
बहस भी स्तरीय नहीं केवल आलोचना ..प्रत्यालोचना और गाली गलौज तक सीमित रहती है .उसका कोई परिणाम भी नहीं निकलता और देखने वाला भी एक नई तरह के मानसिक तनाव का शिकार बन जाता है .
टी .आर .पी .के नाम पर चल रहे इन भौंडे और फूहड़ कार्यक्रमों से चैनल्स के मालिकों के अलावा किसी का भला नहीं होता .
सवाल है फिर क्या करें ......?
क्रमशः जारी ....



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