संसार का केन्द्रबिन्दु कहाँ है ?
इस बात पर विचार करें , हम अपनी आँखों से संसार को देखते हैं और अन्य इन्द्रियों से महसूस करते हैं . जब तक हम संसार में रहते हैं , तब तक संसार रहता है . जब हम नहीं रहते तब संसार के मौजूद होने पर भी संसार हमारे लिए नहीं रहता .
एक उदाहरण से समझते हैं - मैं अपने नाम के आगे अपना खानदानी टाइटल लिखता हूँ . लेकिन मुझे अपने पिता ,दादा ,परदादा और लकड़दादा से आगे किसी का नाम तक नहीं मालूम .
ऐसे ही मेरी आने वाली पीढ़ियों को भी मेरा नाम तक मालूम नहीं होगा .यानी मुझे मालूम ही नहीं कि हम किसका खानदान चला रहे हैं . बात बढ़ाएगे तो बात आदम हौवा तक पहुंचेगी . कुल मिलाकर हम जब तक हैं तभी तक हमारे लिए संसार है .
मरने के बाद क्या होगा ? ऊर्जा रूपी आत्मा कहाँ जाएगी ? संसार में पैदा होने के पहले हम कहाँ थे ? इन सभी दार्शनिक प्रश्नों का कोई एक उत्तर है ही नहीं . अगर उत्तर पाना है तो स्वयं ही ढूँढना होगा . जिनको उत्तर मिल गया वो कहते हैं बताने के लिए शब्द नहीं है . कुल मिलाकर बड़ा कन्फ्यूजन है .
अभी तो इसी लोक में सुबह से शाम तक मायाजाल में उलझा रहता हूँ , यहीं के रोज पैदा होने वाले प्रश्न ही अनुत्तरित हैं .जो दीखता है उस पर विश्वास नहीं होता , जो अंधेरे में है उस पर कैसे विश्वास करें .
हमें मायाजाल से मुक्त कराने का दावा करने वाले खुद हमसे भी ज्यादा मायाजाल में फँसे दिखते हैं .
अभी तो मैं एक सामान्य व्यक्ति हूँ , और मेरेलिए मेरा संसार ही सब कुछ है , अभी तो अपने संसार को और सुन्दर बना सकूँ यही इच्छा है . आखिर अपने संसार का केन्द्रबिंदु तो मैं ही हूँ .
एक उदाहरण से समझते हैं - मैं अपने नाम के आगे अपना खानदानी टाइटल लिखता हूँ . लेकिन मुझे अपने पिता ,दादा ,परदादा और लकड़दादा से आगे किसी का नाम तक नहीं मालूम .
ऐसे ही मेरी आने वाली पीढ़ियों को भी मेरा नाम तक मालूम नहीं होगा .यानी मुझे मालूम ही नहीं कि हम किसका खानदान चला रहे हैं . बात बढ़ाएगे तो बात आदम हौवा तक पहुंचेगी . कुल मिलाकर हम जब तक हैं तभी तक हमारे लिए संसार है .
मरने के बाद क्या होगा ? ऊर्जा रूपी आत्मा कहाँ जाएगी ? संसार में पैदा होने के पहले हम कहाँ थे ? इन सभी दार्शनिक प्रश्नों का कोई एक उत्तर है ही नहीं . अगर उत्तर पाना है तो स्वयं ही ढूँढना होगा . जिनको उत्तर मिल गया वो कहते हैं बताने के लिए शब्द नहीं है . कुल मिलाकर बड़ा कन्फ्यूजन है .
अभी तो इसी लोक में सुबह से शाम तक मायाजाल में उलझा रहता हूँ , यहीं के रोज पैदा होने वाले प्रश्न ही अनुत्तरित हैं .जो दीखता है उस पर विश्वास नहीं होता , जो अंधेरे में है उस पर कैसे विश्वास करें .
हमें मायाजाल से मुक्त कराने का दावा करने वाले खुद हमसे भी ज्यादा मायाजाल में फँसे दिखते हैं .
अभी तो मैं एक सामान्य व्यक्ति हूँ , और मेरेलिए मेरा संसार ही सब कुछ है , अभी तो अपने संसार को और सुन्दर बना सकूँ यही इच्छा है . आखिर अपने संसार का केन्द्रबिंदु तो मैं ही हूँ .

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